डॉक्टर केबिन बेंस ने बताया कि प्रत्येक वर्ष शनि ग्रह पर 1000 टन से अधिक डायमंड की वर्षा होती है।

डॉक्टर केबिन का कहना है कि शनि ग्रह पर उठने वाले भीषण तूफान कार्बन के बादलों का निर्माण करते हैं क्योंकि वहां मेथेन गैस पर्याप्त मात्रा में पाई जाती हैं जो कि कार्बन और हाइड्रोजन से बना योगिक है।

और जैसे ही यह बादल गिरते हैं दबाव बढ़ जाता है और लगभग 1000 मील नीचे गिरने के बाद यह कार्बन ग्रेफाइट में बदल जाता है बिल्कुल वैसा ग्रेफाइट जैसा कि आप की पेंसिल की नोक में है।

लगभग 6000 किलोमीटर की यात्रा करके आते आते यह ग्रेफाइड के टुकड़े सख्त हीरे में परिवर्तित हो जाते हैं हीरे के सक्खत टुकड़े लगभग 30,000किलोमीटर की गहराई तक गिरते है जो कि ढाई पृथ्वी के बराबर है।

एक बार जब यह अपनी चरम गहराई तक पहुंच जाते हैं तो दबाव और तापमान इतना बढ़ जाता है कि हीरे ठोस रह ही नहीं सकते इसलिए वे अपनी ठोस अवस्था को छोड़ देते हैं
यह सोचना हमारे लिए कठिन है कि उस गहराई पर कार्बन किस रूप में होता होगा क्योंकि वहां के तापमान और दबाव के कारण हीरा ठोस ही नहीं सकता फिर भी अनुमान लगाया गया है कि 30,000 किलोमीटर की गहराई तक पहुंचते-पहुंचते कार्बन हीरा नहीं बल्कि एक समुद्र में बदल जाता होगा जिसमें मात्र कार्बन ही होगा।

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